Pran Struggle Story; India Pakistan Partition Violence, Interesting Facts | हीरो से ज्यादा फीस लेते थे विलेन प्राण: बहन की मौत हुई लेकिन शूटिंग करते रहे, बेटी ने कहा- निगेटिव रोल छोड़ो तो कैरेक्टर आर्टिस्ट बने


12 घंटे पहले

  • कॉपी लिंक

आज बॉलीवुड के सबसे खूंखार विलेन प्राण की 104वीं बर्थ एनिवर्सरी है। 7 दशक के एक्टिंग करियर में उन्होंने ऐसे यादगार किरदार निभाए हैं कि लोग उन्हें रियल लाइफ में भी विलेन समझने लगे थे। 362 फिल्मों का हिस्सा रहे प्राण को पद्म भूषण और दादा साहेब फाल्के जैसे सम्मान से नवाजा गया था।

उन्होंने लाहौर सिनेमा से एक्टिंग की शुरुआत की थी। खूंखार विलेन के रोल में उन्होंने सबका ध्यान अपनी तरफ खींच लिया था। वो जब करियर के टाॅप पर थे, तभी विभाजन के दंगों ने उनके करियर पर विराम लगा दिया। इसके बाद उन्हें हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में जीरो से शुरुआत करनी पड़ी।

आज प्राण साहब के जन्मदिन पर पढ़िए उनकी अदाकारी और निजी जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने किस्से…

किस्सा 1- पान की गुमटी पर पहली फिल्म का ऑफर मिला
प्राण सिगरेट के बेहद शौकीन थे। वो 12 साल की उम्र से ही सिगरेट पीने लगे थे। एक दिन लाहौर में जब वो सिगरेट पीने पान की दुकान पर गए तो वहां उन्हें स्क्रिप्ट राइटर वली मोहम्मद वली मिले। वली मोहम्मद उनको घूरने लगे। उन्होंने प्राण से कहा- मैं एक फिल्म बना रहा हूं, उसका एक किरदार बिल्कुल तुम्हारे जैसा ही है।

इसके बाद उन्होंने कागज पर अपना पता लिखकर प्राण को दिया और अगले दिन ऑफिस आकर मिलने को कहा, मगर प्राण ने वली मोहम्मद और उस कागज को जरा भी तवज्जो नहीं दी। कुछ दिनों बाद जब वो वली मोहम्मद से फिर टकराए तो उन्होंने प्राण को मिलने वाली बात याद दिलाई।

आखिर प्राण ने अनमने मन से पूछ ही लिया कि वो क्यों उनसे मिलना चाहते हैं। जवाब में वली मोहम्मद ने फिल्म वाली बात बतलाई। दिलचस्प बात यह है कि तब भी प्राण ने उनकी बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, मगर मिलने को तैयार हो गए।

आखिरकार जब मुलाकात हुई तो वली मोहम्मद ने प्राण को राजी कर लिया। इस तरह प्राण पंजाबी में बनी अपने करियर की पहली फिल्म यमला जट में नजर आए। इसी कारण प्राण वली को अपना गुरु मानते रहे।

किस्सा-2- विभाजन के दंगे ने करियर पर विराम लगा दिया था
विभाजन से पहले प्राण ने 1947 तक लाहौर में रहकर ही फिल्में कीं। 1940 से 1947 के बीच प्राण ने 22 फिल्मों में काम किया, जो लाहौर की फिल्म इंडस्ट्री में बनीं। ये वो दौर था जब खूंखार विलेन के रोल में प्राण सिकंद सबका ध्यान अपनी तरफ खींच रहे थे।

तभी 1947 में देश की आजादी के साथ दंगे शुरू हो गए। दंगे शुरू हुए तो दिल्ली से लाहौर तक एक जैसा ही मंजर था। लाहौर में काम कर रहे प्राण ने अपनी पत्नी शुक्ला अहलूवालिया और एक साल के बेटे अरविंद को मध्य प्रदेश के इंदौर में अपनी भाभी के यहां भेज दिया। उन्हें डर था कि दंगे में परिवार को कुछ हो ना जाए।

11 अगस्त 1947 को प्राण अपने बेटे का जन्मदिन मनाने लाहौर से इंदौर आए। यहां आकर रेडियो पर समाचार सुना तो पता चला लाहौर दंगों की आग में बुरी तरह झुलस गया है और हिंदुओं को वहां चुन-चुन कर मारा जा रहा है। ऐसे में प्राण यहीं रह गए।

1945 के आसपास कोलकाता फिल्म इंडस्ट्री पूरी तरह से मुंबई शिफ्ट हो चुकी थी। उन्होंने सोचा, काम तो ये ही आता है, क्यों ना मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाई जाए। लाहौर में तो नाम चलता ही था, तो यहां भी काम मिलने में दिक्कत नहीं आएगी। ये सोचकर वो परिवार को लेकर मुंबई आ गए, मगर जैसा सोचा था, वैसा हुआ नहीं। मुंबई आने पर काम के सिलसिले में उन्होंने कई प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के ऑफिस के चक्कर लगाए, लेकिन बात नहीं बनी।

किस्सा 3- हीरो से ज्यादा फीस चार्ज करते थे
फिल्म जिद्दी हिट रही, जिसके बाद प्राण को 3 और फिल्मों के ऑफर आए। साथ ही ये बात भी फैल गई कि वो हर फिल्म के लिए 500 रुपए फीस चार्ज करते हैं। इतनी ही फीस हीरो भी लिया करते थे। इस तरह वो ऐसे विलेन बने जिनकी फीस हीरो या बाकी विलेन से ज्यादा होती थी।

एक बार उनके पास एक फिल्म का ऑफर आया। उन्होंने काम करने के लिए हामी भर दी, लेकिन प्रोड्यूसर ने कहा कि 500 रुपए फीस नहीं देंगे, क्योंकि फिल्म के हीरो की ही फीस उतनी है। प्राण ने फिल्म करने से मना कर दिया। बाद में उस प्रोड्यूसर को 100 रुपए ज्यादा फीस दे कर उन्हें कास्ट करना पड़ा। इस तरह उन्हें हीरो से ज्यादा 600 रुपए प्रति महीना उस फिल्म के लिए मिले।

इसके बाद तो उन्होंने अधिकतर फिल्मों में हीरो से ज्यादा फीस चार्ज की। फिल्म गृहस्थी 1948 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म के लिए प्राण को एक हजार रुपए महीना फीस मिलती थी।

किस्सा 4- फिल्मी पर्दे पर रियल लाइफ कैरेक्टर के गेटअप को कॉपी करते थे
प्राण अपने मेकअप को लेकर बहुत सजग रहते थे। अखबार में छपी हुई किसी नेता की फोटो उनको पसंद आती थी तो वो उसे काटकर रख लेते थे। वो ऐसा इसलिए करते थे, क्योंकि जब किसी फिल्म में वो खुद को उसी के जैसे पर्दे पर उतारें तो कोई कमी ना हो।

प्राण अपने घर पर भी मेकअप का सामान रखते थे। फिल्म खानदान में उन्होंने हिटलर के लुक को कॉपी किया था। जुगनू में उन्होंने बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान का गेटअप कॉपी किया था, जिसमें वो प्रोफेसर के रोल में नजर आए थे। फिल्म अमर अकबर एंथनी में उन्होंने पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का गेटअप चुना था।

किस्सा 5- असल में विलेन मान बैठी थीं अरुणा ईरानी
एक बार प्राण हॉन्गकॉन्ग में फिल्म ‘जौहर महमूद इन हॉन्गकॉन्ग’ की शूटिंग कर रहे थे। फिल्म में उनके साथ अरुणा ईरानी भी थीं। दोनों के सीन्स की शूटिंग जल्दी खत्म हो गई, जिसके बाद प्रोड्यूसर ने प्राण से कहा कि वो अरुणा ईरानी के साथ मुंबई चले जाएं।

दोनों की हॉन्गकॉन्ग से कोलकाता, फिर मुंबई की फ्लाइट थी, लेकिन जब वो कोलकाता पहुंचे तब तक मुंबई की फ्लाइट जा चुकी थी। जिस वजह से अगले दिन की फ्लाइट के लिए अरुणा के साथ उन्हें एक होटल में रुकना पड़ा।

इस बात से अरुणा ईरानी डर गईं कि कहीं प्राण उनके साथ कुछ गलत ना कर दें जैसा कि वो फिल्मों में करते हैं। जब दोनों होटल पहुंचे तो प्राण ने उनके कमरे में जा कर कहा- दरवाजा अच्छे से बंद कर लेना, कोई भी आए दरवाजा मत खोलना। देर रात किसी चीज की जरूरत पड़ी तो मुझे बताना, मैं बगल वाले कमरे में हूं। उनकी इस बात से अरुणा बहुत भावुक हो गईं, क्योंकि वो उनको रियल लाइफ में भी विलेन मान बैठी थीं।

किस्सा 6- लोगों ने बच्चों का नाम प्राण रखना बंद कर दिया था
प्राण द्वारा निभाए गए खलनायकों के किरदार के चलते लोग उन्हें सड़कों पर गालियां देते थे। एक समय में लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखना तक बंद कर दिया था। प्राण ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा था- ‘उपकार’ से पहले सड़क पर मुझे देखकर लोग बदमाश, लफंगा और गुंडा कहा करते थे। उन दिनों जब मैं परदे पर आता था तो बच्चे अपनी मां की गोद में दुबक जाया करते थे और मां की साड़ी में मुंह छुपा लेते। रुआंसे होकर पूछते- मम्मी वो चला गया क्या, क्या अब हम अपनी आंखें खोल लें।

किस्सा 7- गुंडा समझ कर दोस्त की बहन प्राण से मिली ही नहीं
फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ में प्राण ने डाकू राका का रोल निभाया था। जब इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली में चल रही थी तो वो एक दिन अपने दोस्त के घर चाय पर गए। दोस्त ने उनकी मुलाकात करवाने के लिए अपनी बहन को बुलाया। बहन प्राण को देखते ही अपने कमरे में भाग गई।

कुछ देर बाद प्राण भी लौट गए। रात को उनके दोस्त ने कॉल किया और बताया- बहन उन्हें देखते ही डर गई थी इसलिए कमरे में भाग गई। उसने मुझसे कहा कि ऐसे गुंडे को घर क्यों बुलाते हो? ये बात सुनकर प्राण खूब हंसे।

किस्सा 8- बहन की मौत के बाद भी शूटिंग अधूरी नहीं छोड़ी
प्राण हमेशा से मिलनसार थे। सेट पर आते ही वो सबका हाल-चाल जरूर पूछते थे। फिल्म उपकार की शूटिंग के दौरान एक दिन ऐसा था कि उन्होंने शाम तक किसी से बात नहीं की। हुआ कुछ यूं था कि एक दिन फिल्म का फाइट सीन फिल्माया जाना था। जब प्राण सेट पर पहुंचे तो उन्होंने किसी से बात नहीं की। फिल्म के हीरो मनोज कुमार को यह बात अटपटी लगी, मगर उन्होंने सोचा कि शायद प्राण साहब डायलॉग प्रैक्टिस में बिजी होंगे।

सुबह से दोपहर हो गई, उन्होंने किसी से बात नहीं की, सिर्फ उदास बैठे रहे। ये देख मनोज कुमार सोचे कि शायद वो थक गए हैं, मगर जब पैकअप के बाद भी उन्होंने किसी से बात नहीं की, तब मनोज कुमार खुद को रोक नहीं पाए और प्राण से इस उदासी का कारण पूछने चले गए।

उदासी का कारण पूछने पर प्राण ने कहा- मैं कल रात जब शूटिंग करके पहुंचा तो कोलकाता से फोन आया। पता चला कि बहन का निधन हो गया है। ये कहते हुए वो रोने लगे। ये सुन मनोज कुमार ने उनसे कहा कि क्यों वो बहन के अंतिम दर्शन में शामिल होने नहीं गए।

जवाब में प्राण ने कहा- मुझे पता है कि आप सभी मुझे जरूर जाने को कहते, मगर कुछ दिन तक शूटिंग रोकने में बहुत ज्यादा खर्च आ जाता। वैसे भी फिल्म मेकिंग में बहुत पैसे लगे हैं। मैं नहीं चाहता हूं कि नुकसान हो। द शो मस्ट गो ऑन। उनकी यह बात सुन मनोज कुमार भावुक हो गए थे।

किस्सा 9- बेटी ने कहा था- अच्छे रोल क्यों नहीं करते, मलंग चाचा से बदली इमेज
फिल्म उपकार से जुड़ा एक किस्सा और भी है। इस फिल्म के पहले रियल लाइफ में लोग प्राण को बदमाश समझते थे। यह बात उनकी बेटी को अच्छी नहीं लगती थी। बेटी ने उनसे कहा- आप हीरो जैसे अच्छे रोल क्यों नहीं करते। बेटी की इस बात से वो सोच में पड़ गए और एक डीसेंट रोल करने का मन बना लिया।

इसी बीच मनोज कुमार उनके पास फिल्म उपकार की स्क्रिप्ट लेकर पहुंच गए। इसकी कहानी मनोज कुमार ने खुद लिखी थी। कहानी लिखते वक्त उन्होंने मलंग चाचा का किरदार प्राण को ध्यान में रखकर लिखा था। कहानी सुन प्राण ने काम करने के लिए हामी भर दी थी।

इस फिल्म का फेमस गाना कसमे वादे प्राण पर फिल्माया गया था। जब म्यूजिक कंपोजर कल्याणजी-आनंदजी को पता चला कि यह गाना प्राण पर फिल्माना है, तो वे चिल्लाते हुए कहने लगे- वो हमारा गाना बर्बाद कर देगा। वहीं किशोर कुमार ने गाने से ही मना कर दिया था।

मगर जब गाने का पहला प्रिंट सभी लोगों ने देखा तो वो प्राण की एक्टिंग से हैरान रह गए। सबको विश्वास हो गया कि वो हर किरदार में ढल सकते हैं।

उपकार की रिलीज के तुरंत बाद प्राण ओम प्रकाश की बेटी की शादी के लिए दिल्ली चले गए। उन्हें अपनी कार लगभग 400 गज दूर पार्क करनी पड़ी और मंडप तक पैदल जाना पड़ा। वो जैसे ही अपनी कार से निकले, वहां मौजूद फैंस कहने लगे- मलंग चाचा आ रहे हैं। उनके लिए रास्ता बनाओ।

ये सुन प्राण भावुक हो गए और कहने लगे- मेरे बारे में लोगों की सोच में रातों-रात हुए बदलाव से सरप्राइज हूं।

किस्सा 10- राजेश खन्ना के साथ प्राण को कास्ट करने में कतराते थे प्रोड्यूसर्स
60 के दशक में हीरो में राजेश खन्ना और विलेन में प्राण का बोलबाला था। हर फिल्ममेकर दोनों को अपनी फिल्म में कास्ट करना चाहते थे। हालांकि, कोई भी दोनों को साथ में कास्ट नहीं करना चाहता था।

उस वक्त राजेश खन्ना एक फिल्म के लिए लगभग 8 लाख रुपए चार्ज करते थे, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी रकम थी। वहीं, प्राण हर फिल्म में हीरो से ज्यादा फीस ही लेते थे। ऐसे में फिल्ममेकर को डर रहता था कि फिल्म की कास्टिंग इन दोनों की फीस से ही बहुत ज्यादा हो जाएगी। ऐसे में लोग उन्हें अलग-अलग ही अपनी फिल्म का हिस्सा बनाते थे।

हालांकि बेवफाई, मर्यादा, दुर्गा, हत्यारा जैसी फिल्मों में काका और प्राण की जोड़ी देखने को मिली।

1998 में 78 साल की उम्र में प्राण को दिल का दौरा पड़ा था। इसके बाद उन्होंने फिल्म में काम नहीं करने का फैसला किया था। मगर, बिग बी की गुजारिश पर उन्होंने तेरे मेरे सपने (1996) और मृत्युदाता (1997) में काम किया था।

2000 से लेकर 2007 तक, उन्हें कुछ और फिल्मों में भी देखा गया था। 12 जुलाई 2013 को 93 साल की उम्र में मुंबई के लीलावती अस्पताल में लंबी बीमारी की वजह से प्राण का निधन हो गया था।

Leave a Comment